चुप से थे लव्ज़ पर आँखें बोल रही थी
समय के रेत पर हमारी धडकनें खेल रही थी
हम थे इतने पास कि सांसें विलय होती थी
स्पर्श से तुम्हारे एक उर्जा सम्मुख होती थी
सभी दुःख और व्याधि छू मंतर होती थी
और हँसी के पल में भी अश्रु बहा करते थे
अब नहीं वो अंगडाईयाँ हैं, अठखेलियों के भी निशां नहीं हैं
कहीं खो कर रह गयी अदा से झपकती पलकें
होठों के भी रंग धूमिल पड़े हैं
गुस्से और प्यार का मिश्रण नहीं अब
रूठ कर मनाना अब रास नहीं हैं
जाने उन पलों को मैंने खोया क्यूँ,
पूरा जो न हो सका,दिल ने वो ख्वाब पिरोया क्यूँ,
उन हसीं लम्हों को गवायाँ क्यूँ
बस यही सवाल है दिल का...
तुम क्यूँ न हुए मेरे, तुम क्यूँ न हुए मेरे