Monday, 1 September 2014

हमराज़ अपना वो बना के तो देखे

हूर पड़ी इक बैठी सामने,
पलट पलट नज़र लागे उसको तकने
दिल करे कुछ गलां कर लूँ
जी चाहे संग उसके हंस लूँ
फिर मन को समझाऊँ,
है वह एक मुसाफ़िर,
करूँ क्या उससे गुज़ारिश,
बस नयनों को कुछ सुकून ले लेने दूं,
 ज़रा खुशबु सी कुछ बिखरी है फ़ज़ा में,
लफ्जों को इनकी ग़ज़ल पढ़ लेने दूँ
कुछ मासूमियत सी उन पलकों में
रंगीन से हलचल में, उज़ली किरणें उसके तन मन में
चाँद तारों की बातें मैं ना करूँ
हमराज़ अपना वो बना के तो देखे
दुग्ध मेखलाओं की श्रृंखलाएँ बना दूँ

Sunday, 17 August 2014

मुतासिर हो तू बस मेरी

मुतासिर हो तू बस मेरी, कह रहा दिल बार बार
 करले मेरे इन आँखों से बातें चार
 धड़कनों को गजल बना दूँ,
सांसें अपनी चुरा के दो चार

 होंठ उनके फूल की पंखुड़ियों सी लगे
 जिस्म उसकी निर्मल धारा सी लगे
 मेरी ग़ज़ल भी कुछ कर दे उनका श्रृंगार
 मौका मिले फिर इसे भी, झूम के गा लेता मल्हार

 हवा जा के फुसफुसा दे कुछ यूँ उनके कानों में,
हम बुन रहे हैं फ़साना, उनके सामने भी रहकर वीरानों में,
 दो चार मुस्कराती नज़रें ही पेश करें वो,
गुलिस्तानों के सारे मुस्कराते फूल रख दूँ उनके रेशम से बदन को भरूं तरानों में
 बस सुन लेती गर वो हलचल हवाओं की
 बरस जाती शायद फिर वही फुहार

मुतासिर हो तू बस मेरी, कह रहा दिल बार बार
 करले मेरे इन आँखों से बातें चार

Friday, 6 June 2014

फिर आज कोई मधुशाला लिख दे

आज कलम कुछ ऐसा लिख दे, अनसुना सा छंद कुछ वैसा लिख दे
सूरज की परिभाषा लिख दे, पृथ्वी की अभिलाषा लिख दे
कब से सोया है चुपचाप, फिर आज कोई मधुशाला लिख दे
इस रंग महल में मैं भी हूँ, तू भी है
रंगत भी है, संगत भी है,
फिर क्यों खोया - खोया सा है,
क्या तू भी सोया - सोया सा है?
अब ख़त्म करो ये ख़ामोशी, बस बहुत हुई अब मायूसी
गरज बरस घनघोर घटा सा, चल तू भी कुछ मनचाहा लिख दे,
कुछ सघन - विरल नवशाला लिख दे
कब से सोया है चुपचाप, फिर आज कोई मधुशाला लिख दे
पर्दा कब तक तू डालेगा, कब राज़ जिया के खोलेगा ?
इस ठगी संसार के आगे कब तक तू मुँह न खोलेगा
ज़रा देखो अपने ईर्द - गिर्द, अजीब सा भागम भाग है, विचित्र से कुछ शोर में,
विलय हुआ अनुराग है
कुछ उम्मीद जगा, फिर दीप जला ,
क्षमता फिर अपनी प्रबल दिखा
उलट - पलट फिर तरंगों जैसा ,
फिर आज कोई नवगाथा लिख दे
चाहे तो खुद की वर्णमाला लिख दे
कब से सोया है चुपचाप, फिर आज कोई मधुशाला लिख दे

Sunday, 1 June 2014

मानवता भी जैसे दिखावटी सी लगती है


चेहरे की मुस्कुराहट बनावटी सी लगती है,
मानवता जैसे दिखावटी सी लगती है
फिर नव रचना को लालायित,
दुनियां छँटी - बँटी सी लगती है

हे सृष्टिकर्ता! तुमने जब मानव बनाया,
कितनी करुणा - सहिष्णुता मानव ने अपनाया
प्यार का महत्व सबसे ऊपर बताया,
अधूरा है मानव बिना 'प्यार', कुछ ऐसा बताया

भौतिकता की आंधी 'मानवता' उड़ाए जा रही,
प्यार मानव के ह्रदय से विलुप्त किये जा रही,
करुणा भरे नयन विर्लय से लगते हैं,
सब बंधन छणिक और भ्रमिक से लगते हैं

मानवता भी जैसे दिखावटी सी लगती है

अद्भुत होगा तब मानव जब न भाषा ज्ञान रही होगी
आँखों से ही बातें होती होंगी, आँखों में प्यार रहा होगा,
प्रकृति की अनंत सुंदरता, मानव में भी रही होगी
प्यार के बस इशारे होते होंगे, इशारों में भी प्यार रहा होगा

आज इशारों में दिलो जान तबाह होती सी लगती है,
प्यार की दुनियां भी तबाह होती सी लगती है
मानवता भी जैसे दिखावटी सी लगती है
फिर नव रचना को लालायित, दुनियां छँटी - बँटी सी लगती है