Saturday, 15 April 2017

निःशब्द

जरा पूछो बरसते बादलों से,
किसने रुलाया है इन्हें,
किसकी याद का साया है,
जो पिघल कर, बूँद बन कर,
इस कदर छीटें उड़ाता,
जैसे कोई झरना पर्वत को,
काटने चला हो !

पूछो जरा इनसे,
इतना पानी संजोया है कहाँ पर,
कहाँ से आग आती है,
कहीं कुछ जलता तो है अक्सर,
तभी तो बर्फ यूँ पिघला कर;
बूंदें गिरा रहा है वो
जैसे कोई मोम, खुद ही जलकर,
रौशनी किसी को दे कर;
फिर से जलने को खड़ा हो

जरा पूछो विशाल पर्वतों से,
इनके बदन पर बूँदें इतनी,
गिरती रहती, बादल भी,
उमरते रहते हैं;
कितने जलधि को जन्म कर,
है शांत, सुबुद्ध सा खड़ा;
इनके भी दिल में अरमां होंगे,
किसी पर बरस जाने की

इतने निःशब्द ये है कैसे,
गंभीरता ये लाते कहाँ से;
धैर्य और बलिदान की,
प्रतिमा बन जाते हैं कैसे!

Sunday, 16 October 2016

यादें तेरी

यादें तेरी जब दिल में यूँ घुसपैठ करती हैं,
जैसे रात की बारिश साँस ठंडी कर जाती है।

मदमस्त हवाओं के झोंके,
बस कहीं से आकर, संग बैठकर गुनगुनाती है।
सुरों को इक लय मिलती है,
कोई खुशबू जब आती है।

लफ़्ज बस ग़जल बनकर,
इन होंठों से उतरते हैं।
पूछो ना फिर सरगोशी का आलम,
मैं कुछ यूँ सँभलता हूँ कि बस,
फिर लड़खड़ाता हूँ।
उठता हूँ, गिरता हूँ,
ये सिलसिला भी ताबड़तोड़ चलता है।

साँसों का कारोबार भी मस्त चलता है;
कभी कुछ ज्यादा गँवाता हूँ,
कभी कुछ कम ही मिलता है।
साँस भला कब धड़कन की गिनती करती है,

यादें तेरी जब दिल में यूँ घुसपैठ करती है।


Sunday, 9 October 2016

अपना मुझे बना लेना

दिल की उस टूटी डाली को,
जब तुमने छू कर देखा था।
जब अश्रु भरे इन नयनों में,
रंग चाहत का तुमने घोला था।

मायूसी चेहरे की मेरे,
तुम्हें रास न आया करती थी।
मुझे हँसाने की खातिर,
कभी नटखट सा कुछ करती थी।

कुछ सुखद छवि उन नयनों की,
दस्तक दे कर यूँ जाते थे।
नित नई चाहत जीने की,
धड़कन को यूँ सिखलाते थे।

क्यूँ हुआ वो सब पल बेगाना,
बेसाज़ हुआ है हर वो तराना।
कभी भूले बिसरे याद आऊँ,
मन के आँगन में फिर तुम आना।

फिर इन सूखे पत्तों पर,
जीवन की कुछ बूँदें टपकाना।
मुरझाये इन फूलों को,
झूम के गाना फिर सिखलाना।
छलक जाये गर आँसू का वो पैमाना,
सिने से मुझे लगा लेना।

फिर अपना मुझे बना लेना,
बस अपना मुझे बना लेना।


Saturday, 8 October 2016

शब्द तुम्हारे ऐसे हैं

गाते हो तो गाओ पक्षी,
सुनने को कब से आतुर हूँ।
नाम तुम्हारा जो भी है,
चंचलता से भरे हुए हो
कुछ शब्द तुम्हारे ऐसे हैं,
बस सुनने को जी करता है।

शाम की इस ठंडी छाँव में,
इक तान फिर से छेड़ दो तुम;
बचपन याद दिलाते हैं स्वर तुम्हारे,
आओ संग मैं भी कुछ गाऊँ,
चलो अब जिद छोड़ भी दो तुम।

वर्षा की ये रूत भी है मनोरम,
सुकून सा भर रहा जैसे तन - मन
अठखेलियाँ करती ये तुम्हारी जोड़ी,
फिर आँखों के सामने कुछ चित्र उभरते हैं यूँ ही
बरबस ही बारिश आती है;
आशाओं के इस आँगन में,
आओ आश्रय ले लो इस सूने क्षितिज तल में।
भर दो कुछ राग जरा सा,
खो जाऊँ कहीं फिर मधुबन में।

रिमझिम रिमझिम बारिश में,
रूनझुन रूनझुन गीत तुम्हारे
कुछ और देर ठहर जाते।
छद्म प्रहर के नगमें बुन कर,
मधु श्रवण कर्ण को दे जाते।
पर वर्षा अब मद्धम् हो चली,
जाओगे तुम भी अपने घर को।
सर छुपा कहीं किसी वृक्ष तले,
आराम दोगे नन्हे पर को।

फिर मिलेंगे किसी शाम,
मीठी करेंगे फिर कुछ यादें,
पर खोलोगे तुम,
और हम ख्वाबों के बाँहें।
पूरे अधूरे क्या रखा है,
बस सूर को सँभाले रखना तुम;

क्यूँ की शब्द तुम्हारे ऐसे हैं,
सुनने को बस जी करता है।



Monday, 3 October 2016

निराली शाम

आई है फिर ये शाम,
हमें करने यूँ बदनाम।
कहती मेरा क्या है?
आज बिखरी हूँ,
कल सँवर जाऊँगी,
आज भद्दी सी हूँ,
कल निखर जाऊँगी।

सोच जरा खुद की अब तो
कोई बँधन रोके है तुझको?
या कोई वक्त चुराये है तुझसे
कब से मैं आस लगाए बैठी हूँ
हँसी लब पे सजाए बैठी हूँ

तेरी भी चाहत है यही,
मैं जानती हूँ
मुझसे मिलने को है आतुर,
मैं जानती हूँ
कर दे सब तू भी सरेआम
ये शाम नहीं है आम,
कभी गालिब कभी खय्य़ाम

आ बैठें कुछ पल साथ
दो चार कर लें सुलझी बात
इस पल जो है,
दूजे पल न होगा
पैमानों में भरा ये जाम न होगा
कर दे खुद को बस मेरे नाम

कुछ छण की तो बात है
फिर रात निराली आ जाएगी,
इन नयनों पर छा जाएगी
गुस्ताखी करती है रात,
खेलती जज़्बातों के साथ
सपने दिखाती, नींदें उड़ाती
करवटों पे थपकीयाँ दे जाती
नशे में लाकर होश उड़ाती
अब मैं ना रही किसी काम
ढ़ल रही है शाम,
खत्म हुआ है ज़ाम।

रात की बाहें खुली हैं
अब कर ले थोड़ा आराम।
गर फिर कल मिली ये शाम,
देंगे फिर इसे कोई नाम।
मैं हूँ भोली, थोड़ी बहक जाती हूँ,
आँखों से कभी छलक जाती हूँ
सँभाल के रखो मोतीयों को
वरना करेंगे सब मेरी बुराई,
लगेगा हम पे सब इल्ज़ाम।

बस चलती है अब शाम।

Saturday, 7 March 2015

24/7 की यादें

अनोखे से उस दुनिया में, कुछ लोग अनोखे बसते थे;
मस्ती के उन लम्हों में, हंसी के फ़साने बुनते थे;
याद फिर उन लम्हों की आती है,
होठों पे खुशियों की चादर बिछाया करते थे

"शबनम" सी थी वह चांदनी, "सिंधु" की वाक् धारा बहती थी
"दीन" होता था कितना रमणीय, "प्रवीण" जब कार्यशैली होती थी
शबनम की अदा निराली, नखरे कुछ अजब से होते थे
"नारायण" की टिप्पणियों पर हंसी के फव्वार्रे छूटते थे

Farzu, Dinsu, Shabbu, Sandra -- ये नाम कर्णप्रिय होते थे,
Garry, Bajji, Sami, JayD के सब लोग दीवाने होते थे;
Poonam, Halini, Anu जैसे कुछ नाम नए से उभरे थे,
"Sudha Rani" भी रानी थी, Ethinic day पर जब हम सजते थे;

हिरणी सी आँखें थी उसकी, Halini' तो आखिर हरिणी थी,
मधुर स्वर और भोलापन, सबको आकर्षित करती थी
Paul was the man, man! Deeps भी सुर्ख़ियों में होती थी
रोज़ रंग चढ़ता था नया, और समां भी नयी बंधती थी
संगीत के चाहने वालों की, एक फ़ौज़ भी उमड़ा करती थी

उत्साहित, उत्प्रेरित से थे सब लोग, उदासी के निशाँ दुर्लभ होते थे
शब्दों के ही बाण सभी के, लफ्जों में हंसी के स्वर भरते थे
हर-एक की सफलता में हम, अपनी भी सफलता देखते थे

लम्हें शायद वह अब भी वहीँ, पृथक पर हम हो चले हैं
हंसी ख़ुशी तो है अब भी, पर थोड़े नीरस से हो चले हैं

रहे सदा वह आलम ख़ुशी का, लोग तो आते जाते रहेंगे
पर उन अनोखे लम्हों को, हम याद हमेशा किया करेंगे |

रहगुज़र

कब के मिले हम, आज फिर से बिछड़ चले हैं
बस बिछड़ चले हैं

कस्ती पार लगी ना लगी, साँसों के पैमाने जैसे टूट चले हैं

कश्तियाँ आती जाती रहेंगी, रहगुज़र बस बदलते रहेंगे
कहीं कभी किसी किनारे पर, हम फिर बैठे मुस्कुराएंगे
यादें फिर बीते दिनों की लिए, सपनों की दुनियां बसाएंगे

फिर मोती आँखों में भर चले हैं
कब के मिले हम, आज फिर बिछड़ चले हैं

तुम सा गर फिर कोई मिल जाएगा,
दिल को ज़रा सुकून शायद मिल पायेगा
बस यही आश दिल में लिए, धड़कनों को थामे,
निगाहें बस हम फेर चले हैं

कब के मिले हम, आज फिर बिछड़ चले हैं

कस्ती न थी ये कागज़ की, जो बचपन के संग भूल जाएँ
पाने को अभी बहुत कुछ है, खोने को अभी सब बाकी है
पर दिल की इस खलिश को, कैसे भला यूँ भूल जाएँ

ठहरा पल, ठहरी सी ज़िन्दगी, पाँव जैसे ठहरे से चले हैं

कब के मिले हम, आज बस बिछड़ चले हैं

कस्ती पार लगी न लगी,
साँसों के पैमाने जैसे टूट चले हैं

Wednesday, 4 March 2015

प्यार से प्यार करे ये नैना

इतने चंचल न होवे नैना, जिगर में प्यास दिए दिन रैना
दिल की तड़प को पढ़ ले ज़ालिम, जब यूँ हंस हंस के ताके नैना

सजा सुनहरे ख्वाहिश को इसने, कितनों की फितरत बदली  है;
मजहब कितनों की बदली है, करतब हर किस की बदली है,
वार करे मदमस्त लगे, दो धारी तलवार ये नैना;
घायल कर इस कदर जिया को, हर पल हर क्षण खुश होवे नैना

इतने  चंचल न होवे नैना, प्यार से प्यार करे ये नैना

उन मखमली पलकों के पीछे,  कुछ सपने छुपे तो हैं,
जूनून ए इश्क़ की तलाश में  हर पल ये तड़पे तो हैं
इक आजाद पंछी की उड़ान, हर छन  भरना  चाहे ये नैना
दिल की दहलीज़ पर दस्तक सा, हर पल हर क्षण देवे ये नैना

कुछ नादाँ से हैं ये नैना, जिगर में प्यास दिए दिन रैना
दिल की  तड़प को पढ़ ले ज़ालिम, जब जब अन्दर से झांके नैना

इतने चंचल न होवे नैना, बस प्यार से प्यार करे ये नैना