जानता हूँ मैं तुम्हें पा नहीं सकता,
फिर भी खोने का डर है मुझे
जानता हूँ तुम ख्वाबों से जा नहीं सकते,
फिर भी ख्वाबों को अकेला पाता हूँ
जानता हूँ तुम भी अक्सर यादों में डूबते हो मेरे ,
फिर भी मैं तुम्हारी यादों को तन्हा पाता हूँ
जीवन कम हैं तनहाइयाँ अनवरत, किसका साथ निभाऊँ
मैं तो बस डरता हूँ तेरे ख्वाबों को खोने से
माना सभी ख्वाब पुरे नहीं होते
अधूरे ख्वाब ही जीवन को उत्प्रेरित करते हैं
काश ये मुमकिन होता
आधे तुम्हारे और आधे हमारे, मिलकर हो जाते एक ख्वाब पुरे
जीवन का फिर एक सारांश होता
और हम तुम एक शीर्षक होते
दुनिया ये कहानी पढ़ती, उत्साहित होती
और फिर नए ख्वाबों का जन्म होता