Monday, 10 September 2012

ख्वाबों का जन्म



जानता हूँ मैं तुम्हें पा नहीं सकता,
फिर भी खोने का डर है मुझे
जानता हूँ तुम ख्वाबों से जा नहीं सकते,
फिर भी ख्वाबों को अकेला पाता हूँ
जानता हूँ  तुम भी अक्सर यादों में डूबते हो मेरे ,
फिर भी मैं तुम्हारी यादों को तन्हा पाता हूँ
जीवन कम हैं तनहाइयाँ अनवरत, किसका साथ निभाऊँ
मैं तो बस डरता हूँ तेरे ख्वाबों को खोने से
माना सभी ख्वाब पुरे नहीं होते
अधूरे ख्वाब ही जीवन को उत्प्रेरित करते हैं
काश ये मुमकिन होता
आधे तुम्हारे और आधे हमारे, मिलकर हो जाते एक ख्वाब पुरे
जीवन का फिर एक सारांश होता
और हम तुम एक शीर्षक होते
 दुनिया ये कहानी पढ़ती, उत्साहित होती
और फिर नए ख्वाबों का जन्म होता

ख़ामोशी और शोर


आज मैंने फिर सुना है अंतर्मन का शोर

व्याकुलता की सीमा लाँघ मैं गया उस ओर

ठंढ़ी आहें, गर्म हवाएँ, गर्जन बादलों का,

सप्त किरणों की लड़ियाँ ,

जिजीविषा की अपार सागर में,

गिन रहा था अनंत घड़ियाँ ,

लिए आशाओं की अनवरत डोर

अविरल और अनंत सी थी सभी परछाइयाँ

काश मैं कभी वापस न आता

जा कर कहीं उन किरणों में खो जाता

कोई आकान्छाएं न होती, जिजीविषा न होती

अचित्र और अनन्य होता सब कुछ

न होती ये ख़ामोशी और न ही कोई शोर

क्या मैं अब भी झूठा हूँ ?


कितना मैंने उसको चाहा, सपनों में भी भूल न पाया,
दिल से हरदम उसे लगाया,

पर वो कहती "तुम झूठे हो "

तन्हा कितनी रातें गुजारी, उसकी यादें आखों में रही,
तन मन उसको देना चाहा,

पर वो कहती "तुम झूठे  हो"

जीना तुम बिन कैसा जीना, अंगूठी जैसे बिन नगीना
जितना उसको भूलना चाहा, उतना करीब उसको पाया

पर वो  कहती "तुम झूठे हो "

होगी तुम्हारी भी कुछ मज़बूरी; आँसू होंगे आँखों में भी तेरी
तुम भी न भूल पायी मुझे,दिल में हमेशा मुझको पाया

फिर क्यूँ कहती "मैं  झूठा हूँ "?

मेरी कविता तुम से है, संगीत भी बस तुम्हीं से  है
जीवन के डोर के हर छोर पे मैंने तुझको पाया

फिर कैसे मैं झूठा हूँ ?

जागती आँखें ख्वाबों में, सिरहाने पर तुझको ढूँढ़ती हैं
सोयी आँखें सपने में, तुमसे ही बातें करती हैं
दिन को रौशन तुझमें पाया, रात को शीतल तुमने बनाया

"क्या मैं अब भी झूठा हूँ "?