Sunday, 16 October 2016

यादें तेरी

यादें तेरी जब दिल में यूँ घुसपैठ करती हैं,
जैसे रात की बारिश साँस ठंडी कर जाती है।

मदमस्त हवाओं के झोंके,
बस कहीं से आकर, संग बैठकर गुनगुनाती है।
सुरों को इक लय मिलती है,
कोई खुशबू जब आती है।

लफ़्ज बस ग़जल बनकर,
इन होंठों से उतरते हैं।
पूछो ना फिर सरगोशी का आलम,
मैं कुछ यूँ सँभलता हूँ कि बस,
फिर लड़खड़ाता हूँ।
उठता हूँ, गिरता हूँ,
ये सिलसिला भी ताबड़तोड़ चलता है।

साँसों का कारोबार भी मस्त चलता है;
कभी कुछ ज्यादा गँवाता हूँ,
कभी कुछ कम ही मिलता है।
साँस भला कब धड़कन की गिनती करती है,

यादें तेरी जब दिल में यूँ घुसपैठ करती है।


Sunday, 9 October 2016

अपना मुझे बना लेना

दिल की उस टूटी डाली को,
जब तुमने छू कर देखा था।
जब अश्रु भरे इन नयनों में,
रंग चाहत का तुमने घोला था।

मायूसी चेहरे की मेरे,
तुम्हें रास न आया करती थी।
मुझे हँसाने की खातिर,
कभी नटखट सा कुछ करती थी।

कुछ सुखद छवि उन नयनों की,
दस्तक दे कर यूँ जाते थे।
नित नई चाहत जीने की,
धड़कन को यूँ सिखलाते थे।

क्यूँ हुआ वो सब पल बेगाना,
बेसाज़ हुआ है हर वो तराना।
कभी भूले बिसरे याद आऊँ,
मन के आँगन में फिर तुम आना।

फिर इन सूखे पत्तों पर,
जीवन की कुछ बूँदें टपकाना।
मुरझाये इन फूलों को,
झूम के गाना फिर सिखलाना।
छलक जाये गर आँसू का वो पैमाना,
सिने से मुझे लगा लेना।

फिर अपना मुझे बना लेना,
बस अपना मुझे बना लेना।


Saturday, 8 October 2016

शब्द तुम्हारे ऐसे हैं

गाते हो तो गाओ पक्षी,
सुनने को कब से आतुर हूँ।
नाम तुम्हारा जो भी है,
चंचलता से भरे हुए हो
कुछ शब्द तुम्हारे ऐसे हैं,
बस सुनने को जी करता है।

शाम की इस ठंडी छाँव में,
इक तान फिर से छेड़ दो तुम;
बचपन याद दिलाते हैं स्वर तुम्हारे,
आओ संग मैं भी कुछ गाऊँ,
चलो अब जिद छोड़ भी दो तुम।

वर्षा की ये रूत भी है मनोरम,
सुकून सा भर रहा जैसे तन - मन
अठखेलियाँ करती ये तुम्हारी जोड़ी,
फिर आँखों के सामने कुछ चित्र उभरते हैं यूँ ही
बरबस ही बारिश आती है;
आशाओं के इस आँगन में,
आओ आश्रय ले लो इस सूने क्षितिज तल में।
भर दो कुछ राग जरा सा,
खो जाऊँ कहीं फिर मधुबन में।

रिमझिम रिमझिम बारिश में,
रूनझुन रूनझुन गीत तुम्हारे
कुछ और देर ठहर जाते।
छद्म प्रहर के नगमें बुन कर,
मधु श्रवण कर्ण को दे जाते।
पर वर्षा अब मद्धम् हो चली,
जाओगे तुम भी अपने घर को।
सर छुपा कहीं किसी वृक्ष तले,
आराम दोगे नन्हे पर को।

फिर मिलेंगे किसी शाम,
मीठी करेंगे फिर कुछ यादें,
पर खोलोगे तुम,
और हम ख्वाबों के बाँहें।
पूरे अधूरे क्या रखा है,
बस सूर को सँभाले रखना तुम;

क्यूँ की शब्द तुम्हारे ऐसे हैं,
सुनने को बस जी करता है।



Monday, 3 October 2016

निराली शाम

आई है फिर ये शाम,
हमें करने यूँ बदनाम।
कहती मेरा क्या है?
आज बिखरी हूँ,
कल सँवर जाऊँगी,
आज भद्दी सी हूँ,
कल निखर जाऊँगी।

सोच जरा खुद की अब तो
कोई बँधन रोके है तुझको?
या कोई वक्त चुराये है तुझसे
कब से मैं आस लगाए बैठी हूँ
हँसी लब पे सजाए बैठी हूँ

तेरी भी चाहत है यही,
मैं जानती हूँ
मुझसे मिलने को है आतुर,
मैं जानती हूँ
कर दे सब तू भी सरेआम
ये शाम नहीं है आम,
कभी गालिब कभी खय्य़ाम

आ बैठें कुछ पल साथ
दो चार कर लें सुलझी बात
इस पल जो है,
दूजे पल न होगा
पैमानों में भरा ये जाम न होगा
कर दे खुद को बस मेरे नाम

कुछ छण की तो बात है
फिर रात निराली आ जाएगी,
इन नयनों पर छा जाएगी
गुस्ताखी करती है रात,
खेलती जज़्बातों के साथ
सपने दिखाती, नींदें उड़ाती
करवटों पे थपकीयाँ दे जाती
नशे में लाकर होश उड़ाती
अब मैं ना रही किसी काम
ढ़ल रही है शाम,
खत्म हुआ है ज़ाम।

रात की बाहें खुली हैं
अब कर ले थोड़ा आराम।
गर फिर कल मिली ये शाम,
देंगे फिर इसे कोई नाम।
मैं हूँ भोली, थोड़ी बहक जाती हूँ,
आँखों से कभी छलक जाती हूँ
सँभाल के रखो मोतीयों को
वरना करेंगे सब मेरी बुराई,
लगेगा हम पे सब इल्ज़ाम।

बस चलती है अब शाम।