Friday, 6 June 2014

फिर आज कोई मधुशाला लिख दे

आज कलम कुछ ऐसा लिख दे, अनसुना सा छंद कुछ वैसा लिख दे
सूरज की परिभाषा लिख दे, पृथ्वी की अभिलाषा लिख दे
कब से सोया है चुपचाप, फिर आज कोई मधुशाला लिख दे
इस रंग महल में मैं भी हूँ, तू भी है
रंगत भी है, संगत भी है,
फिर क्यों खोया - खोया सा है,
क्या तू भी सोया - सोया सा है?
अब ख़त्म करो ये ख़ामोशी, बस बहुत हुई अब मायूसी
गरज बरस घनघोर घटा सा, चल तू भी कुछ मनचाहा लिख दे,
कुछ सघन - विरल नवशाला लिख दे
कब से सोया है चुपचाप, फिर आज कोई मधुशाला लिख दे
पर्दा कब तक तू डालेगा, कब राज़ जिया के खोलेगा ?
इस ठगी संसार के आगे कब तक तू मुँह न खोलेगा
ज़रा देखो अपने ईर्द - गिर्द, अजीब सा भागम भाग है, विचित्र से कुछ शोर में,
विलय हुआ अनुराग है
कुछ उम्मीद जगा, फिर दीप जला ,
क्षमता फिर अपनी प्रबल दिखा
उलट - पलट फिर तरंगों जैसा ,
फिर आज कोई नवगाथा लिख दे
चाहे तो खुद की वर्णमाला लिख दे
कब से सोया है चुपचाप, फिर आज कोई मधुशाला लिख दे

Sunday, 1 June 2014

मानवता भी जैसे दिखावटी सी लगती है


चेहरे की मुस्कुराहट बनावटी सी लगती है,
मानवता जैसे दिखावटी सी लगती है
फिर नव रचना को लालायित,
दुनियां छँटी - बँटी सी लगती है

हे सृष्टिकर्ता! तुमने जब मानव बनाया,
कितनी करुणा - सहिष्णुता मानव ने अपनाया
प्यार का महत्व सबसे ऊपर बताया,
अधूरा है मानव बिना 'प्यार', कुछ ऐसा बताया

भौतिकता की आंधी 'मानवता' उड़ाए जा रही,
प्यार मानव के ह्रदय से विलुप्त किये जा रही,
करुणा भरे नयन विर्लय से लगते हैं,
सब बंधन छणिक और भ्रमिक से लगते हैं

मानवता भी जैसे दिखावटी सी लगती है

अद्भुत होगा तब मानव जब न भाषा ज्ञान रही होगी
आँखों से ही बातें होती होंगी, आँखों में प्यार रहा होगा,
प्रकृति की अनंत सुंदरता, मानव में भी रही होगी
प्यार के बस इशारे होते होंगे, इशारों में भी प्यार रहा होगा

आज इशारों में दिलो जान तबाह होती सी लगती है,
प्यार की दुनियां भी तबाह होती सी लगती है
मानवता भी जैसे दिखावटी सी लगती है
फिर नव रचना को लालायित, दुनियां छँटी - बँटी सी लगती है