Sunday, 1 June 2014

मानवता भी जैसे दिखावटी सी लगती है


चेहरे की मुस्कुराहट बनावटी सी लगती है,
मानवता जैसे दिखावटी सी लगती है
फिर नव रचना को लालायित,
दुनियां छँटी - बँटी सी लगती है

हे सृष्टिकर्ता! तुमने जब मानव बनाया,
कितनी करुणा - सहिष्णुता मानव ने अपनाया
प्यार का महत्व सबसे ऊपर बताया,
अधूरा है मानव बिना 'प्यार', कुछ ऐसा बताया

भौतिकता की आंधी 'मानवता' उड़ाए जा रही,
प्यार मानव के ह्रदय से विलुप्त किये जा रही,
करुणा भरे नयन विर्लय से लगते हैं,
सब बंधन छणिक और भ्रमिक से लगते हैं

मानवता भी जैसे दिखावटी सी लगती है

अद्भुत होगा तब मानव जब न भाषा ज्ञान रही होगी
आँखों से ही बातें होती होंगी, आँखों में प्यार रहा होगा,
प्रकृति की अनंत सुंदरता, मानव में भी रही होगी
प्यार के बस इशारे होते होंगे, इशारों में भी प्यार रहा होगा

आज इशारों में दिलो जान तबाह होती सी लगती है,
प्यार की दुनियां भी तबाह होती सी लगती है
मानवता भी जैसे दिखावटी सी लगती है
फिर नव रचना को लालायित, दुनियां छँटी - बँटी सी लगती है

1 comment:

  1. तेरी रचनाओ को कैसे मैं सब्दों का श्रृंगार करूँ
    अछरांसो का शेष बचा है कैसे इससे तेरा अभिषेक करूँ
    भावो की सीमा साँसों तक है मैं इसे समर्पण करता हूँ
    सर्वश न्योछावर करके मैं तेरा अभिनन्दन करता हूँ ।

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