Monday, 1 September 2014

हमराज़ अपना वो बना के तो देखे

हूर पड़ी इक बैठी सामने,
पलट पलट नज़र लागे उसको तकने
दिल करे कुछ गलां कर लूँ
जी चाहे संग उसके हंस लूँ
फिर मन को समझाऊँ,
है वह एक मुसाफ़िर,
करूँ क्या उससे गुज़ारिश,
बस नयनों को कुछ सुकून ले लेने दूं,
 ज़रा खुशबु सी कुछ बिखरी है फ़ज़ा में,
लफ्जों को इनकी ग़ज़ल पढ़ लेने दूँ
कुछ मासूमियत सी उन पलकों में
रंगीन से हलचल में, उज़ली किरणें उसके तन मन में
चाँद तारों की बातें मैं ना करूँ
हमराज़ अपना वो बना के तो देखे
दुग्ध मेखलाओं की श्रृंखलाएँ बना दूँ

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