आज मैंने फिर सुना है अंतर्मन का शोर
व्याकुलता की सीमा लाँघ मैं गया उस ओर
ठंढ़ी आहें, गर्म हवाएँ, गर्जन बादलों का,
सप्त किरणों की लड़ियाँ ,
जिजीविषा की अपार सागर में,
गिन रहा था अनंत घड़ियाँ ,
लिए आशाओं की अनवरत डोर
अविरल और अनंत सी थी सभी परछाइयाँ
काश मैं कभी वापस न आता
जा कर कहीं उन किरणों में खो जाता
कोई आकान्छाएं न होती, जिजीविषा न होती
अचित्र और अनन्य होता सब कुछ
न होती ये ख़ामोशी और न ही कोई शोर
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