कितना मैंने उसको चाहा, सपनों में भी भूल न पाया,
दिल से हरदम उसे लगाया,
पर वो कहती "तुम झूठे हो "
तन्हा कितनी रातें गुजारी, उसकी यादें आखों में रही,
तन मन उसको देना चाहा,
पर वो कहती "तुम झूठे हो"
जीना तुम बिन कैसा जीना, अंगूठी जैसे बिन नगीना
जितना उसको भूलना चाहा, उतना करीब उसको पाया
पर वो कहती "तुम झूठे हो "
होगी तुम्हारी भी कुछ मज़बूरी; आँसू होंगे आँखों में भी तेरी
तुम भी न भूल पायी मुझे,दिल में हमेशा मुझको पाया
फिर क्यूँ कहती "मैं झूठा हूँ "?
मेरी कविता तुम से है, संगीत भी बस तुम्हीं से है
जीवन के डोर के हर छोर पे मैंने तुझको पाया
फिर कैसे मैं झूठा हूँ ?
जागती आँखें ख्वाबों में, सिरहाने पर तुझको ढूँढ़ती हैं
सोयी आँखें सपने में, तुमसे ही बातें करती हैं
दिन को रौशन तुझमें पाया, रात को शीतल तुमने बनाया
"क्या मैं अब भी झूठा हूँ "?
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