Saturday, 7 March 2015

रहगुज़र

कब के मिले हम, आज फिर से बिछड़ चले हैं
बस बिछड़ चले हैं

कस्ती पार लगी ना लगी, साँसों के पैमाने जैसे टूट चले हैं

कश्तियाँ आती जाती रहेंगी, रहगुज़र बस बदलते रहेंगे
कहीं कभी किसी किनारे पर, हम फिर बैठे मुस्कुराएंगे
यादें फिर बीते दिनों की लिए, सपनों की दुनियां बसाएंगे

फिर मोती आँखों में भर चले हैं
कब के मिले हम, आज फिर बिछड़ चले हैं

तुम सा गर फिर कोई मिल जाएगा,
दिल को ज़रा सुकून शायद मिल पायेगा
बस यही आश दिल में लिए, धड़कनों को थामे,
निगाहें बस हम फेर चले हैं

कब के मिले हम, आज फिर बिछड़ चले हैं

कस्ती न थी ये कागज़ की, जो बचपन के संग भूल जाएँ
पाने को अभी बहुत कुछ है, खोने को अभी सब बाकी है
पर दिल की इस खलिश को, कैसे भला यूँ भूल जाएँ

ठहरा पल, ठहरी सी ज़िन्दगी, पाँव जैसे ठहरे से चले हैं

कब के मिले हम, आज बस बिछड़ चले हैं

कस्ती पार लगी न लगी,
साँसों के पैमाने जैसे टूट चले हैं

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