जरा पूछो बरसते बादलों से,
किसने रुलाया है इन्हें,
किसकी याद का साया है,
जो पिघल कर, बूँद बन कर,
इस कदर छीटें उड़ाता,
जैसे कोई झरना पर्वत को,
काटने चला हो !
पूछो जरा इनसे,
इतना पानी संजोया है कहाँ पर,
कहाँ से आग आती है,
कहीं कुछ जलता तो है अक्सर,
तभी तो बर्फ यूँ पिघला कर;
बूंदें गिरा रहा है वो
जैसे कोई मोम, खुद ही जलकर,
रौशनी किसी को दे कर;
फिर से जलने को खड़ा हो
जरा पूछो विशाल पर्वतों से,
इनके बदन पर बूँदें इतनी,
गिरती रहती, बादल भी,
उमरते रहते हैं;
कितने जलधि को जन्म कर,
है शांत, सुबुद्ध सा खड़ा;
इनके भी दिल में अरमां होंगे,
किसी पर बरस जाने की
इतने निःशब्द ये है कैसे,
गंभीरता ये लाते कहाँ से;
धैर्य और बलिदान की,
प्रतिमा बन जाते हैं कैसे!
किसने रुलाया है इन्हें,
किसकी याद का साया है,
जो पिघल कर, बूँद बन कर,
इस कदर छीटें उड़ाता,
जैसे कोई झरना पर्वत को,
काटने चला हो !
पूछो जरा इनसे,
इतना पानी संजोया है कहाँ पर,
कहाँ से आग आती है,
कहीं कुछ जलता तो है अक्सर,
तभी तो बर्फ यूँ पिघला कर;
बूंदें गिरा रहा है वो
जैसे कोई मोम, खुद ही जलकर,
रौशनी किसी को दे कर;
फिर से जलने को खड़ा हो
जरा पूछो विशाल पर्वतों से,
इनके बदन पर बूँदें इतनी,
गिरती रहती, बादल भी,
उमरते रहते हैं;
कितने जलधि को जन्म कर,
है शांत, सुबुद्ध सा खड़ा;
इनके भी दिल में अरमां होंगे,
किसी पर बरस जाने की
इतने निःशब्द ये है कैसे,
गंभीरता ये लाते कहाँ से;
धैर्य और बलिदान की,
प्रतिमा बन जाते हैं कैसे!
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