यादें तेरी जब दिल में यूँ घुसपैठ करती हैं,
जैसे रात की बारिश साँस ठंडी कर जाती है।
मदमस्त हवाओं के झोंके,
बस कहीं से आकर, संग बैठकर गुनगुनाती है।
सुरों को इक लय मिलती है,
कोई खुशबू जब आती है।
लफ़्ज बस ग़जल बनकर,
इन होंठों से उतरते हैं।
पूछो ना फिर सरगोशी का आलम,
मैं कुछ यूँ सँभलता हूँ कि बस,
फिर लड़खड़ाता हूँ।
उठता हूँ, गिरता हूँ,
ये सिलसिला भी ताबड़तोड़ चलता है।
साँसों का कारोबार भी मस्त चलता है;
कभी कुछ ज्यादा गँवाता हूँ,
कभी कुछ कम ही मिलता है।
साँस भला कब धड़कन की गिनती करती है,
यादें तेरी जब दिल में यूँ घुसपैठ करती है।
जैसे रात की बारिश साँस ठंडी कर जाती है।
मदमस्त हवाओं के झोंके,
बस कहीं से आकर, संग बैठकर गुनगुनाती है।
सुरों को इक लय मिलती है,
कोई खुशबू जब आती है।
लफ़्ज बस ग़जल बनकर,
इन होंठों से उतरते हैं।
पूछो ना फिर सरगोशी का आलम,
मैं कुछ यूँ सँभलता हूँ कि बस,
फिर लड़खड़ाता हूँ।
उठता हूँ, गिरता हूँ,
ये सिलसिला भी ताबड़तोड़ चलता है।
साँसों का कारोबार भी मस्त चलता है;
कभी कुछ ज्यादा गँवाता हूँ,
कभी कुछ कम ही मिलता है।
साँस भला कब धड़कन की गिनती करती है,
यादें तेरी जब दिल में यूँ घुसपैठ करती है।
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