Saturday, 8 October 2016

शब्द तुम्हारे ऐसे हैं

गाते हो तो गाओ पक्षी,
सुनने को कब से आतुर हूँ।
नाम तुम्हारा जो भी है,
चंचलता से भरे हुए हो
कुछ शब्द तुम्हारे ऐसे हैं,
बस सुनने को जी करता है।

शाम की इस ठंडी छाँव में,
इक तान फिर से छेड़ दो तुम;
बचपन याद दिलाते हैं स्वर तुम्हारे,
आओ संग मैं भी कुछ गाऊँ,
चलो अब जिद छोड़ भी दो तुम।

वर्षा की ये रूत भी है मनोरम,
सुकून सा भर रहा जैसे तन - मन
अठखेलियाँ करती ये तुम्हारी जोड़ी,
फिर आँखों के सामने कुछ चित्र उभरते हैं यूँ ही
बरबस ही बारिश आती है;
आशाओं के इस आँगन में,
आओ आश्रय ले लो इस सूने क्षितिज तल में।
भर दो कुछ राग जरा सा,
खो जाऊँ कहीं फिर मधुबन में।

रिमझिम रिमझिम बारिश में,
रूनझुन रूनझुन गीत तुम्हारे
कुछ और देर ठहर जाते।
छद्म प्रहर के नगमें बुन कर,
मधु श्रवण कर्ण को दे जाते।
पर वर्षा अब मद्धम् हो चली,
जाओगे तुम भी अपने घर को।
सर छुपा कहीं किसी वृक्ष तले,
आराम दोगे नन्हे पर को।

फिर मिलेंगे किसी शाम,
मीठी करेंगे फिर कुछ यादें,
पर खोलोगे तुम,
और हम ख्वाबों के बाँहें।
पूरे अधूरे क्या रखा है,
बस सूर को सँभाले रखना तुम;

क्यूँ की शब्द तुम्हारे ऐसे हैं,
सुनने को बस जी करता है।



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