Monday, 3 October 2016

निराली शाम

आई है फिर ये शाम,
हमें करने यूँ बदनाम।
कहती मेरा क्या है?
आज बिखरी हूँ,
कल सँवर जाऊँगी,
आज भद्दी सी हूँ,
कल निखर जाऊँगी।

सोच जरा खुद की अब तो
कोई बँधन रोके है तुझको?
या कोई वक्त चुराये है तुझसे
कब से मैं आस लगाए बैठी हूँ
हँसी लब पे सजाए बैठी हूँ

तेरी भी चाहत है यही,
मैं जानती हूँ
मुझसे मिलने को है आतुर,
मैं जानती हूँ
कर दे सब तू भी सरेआम
ये शाम नहीं है आम,
कभी गालिब कभी खय्य़ाम

आ बैठें कुछ पल साथ
दो चार कर लें सुलझी बात
इस पल जो है,
दूजे पल न होगा
पैमानों में भरा ये जाम न होगा
कर दे खुद को बस मेरे नाम

कुछ छण की तो बात है
फिर रात निराली आ जाएगी,
इन नयनों पर छा जाएगी
गुस्ताखी करती है रात,
खेलती जज़्बातों के साथ
सपने दिखाती, नींदें उड़ाती
करवटों पे थपकीयाँ दे जाती
नशे में लाकर होश उड़ाती
अब मैं ना रही किसी काम
ढ़ल रही है शाम,
खत्म हुआ है ज़ाम।

रात की बाहें खुली हैं
अब कर ले थोड़ा आराम।
गर फिर कल मिली ये शाम,
देंगे फिर इसे कोई नाम।
मैं हूँ भोली, थोड़ी बहक जाती हूँ,
आँखों से कभी छलक जाती हूँ
सँभाल के रखो मोतीयों को
वरना करेंगे सब मेरी बुराई,
लगेगा हम पे सब इल्ज़ाम।

बस चलती है अब शाम।

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