मुतासिर हो तू बस मेरी, कह रहा दिल बार बार
करले मेरे इन आँखों से बातें चार
धड़कनों को गजल बना दूँ,
सांसें अपनी चुरा के दो चार
होंठ उनके फूल की पंखुड़ियों सी लगे
जिस्म उसकी निर्मल धारा सी लगे
मेरी ग़ज़ल भी कुछ कर दे उनका श्रृंगार
मौका मिले फिर इसे भी, झूम के गा लेता मल्हार
हवा जा के फुसफुसा दे कुछ यूँ उनके कानों में,
हम बुन रहे हैं फ़साना, उनके सामने भी रहकर वीरानों में,
दो चार मुस्कराती नज़रें ही पेश करें वो,
गुलिस्तानों के सारे मुस्कराते फूल रख दूँ उनके रेशम से बदन को भरूं तरानों में
बस सुन लेती गर वो हलचल हवाओं की
बरस जाती शायद फिर वही फुहार
मुतासिर हो तू बस मेरी, कह रहा दिल बार बार
करले मेरे इन आँखों से बातें चार
करले मेरे इन आँखों से बातें चार
धड़कनों को गजल बना दूँ,
सांसें अपनी चुरा के दो चार
होंठ उनके फूल की पंखुड़ियों सी लगे
जिस्म उसकी निर्मल धारा सी लगे
मेरी ग़ज़ल भी कुछ कर दे उनका श्रृंगार
मौका मिले फिर इसे भी, झूम के गा लेता मल्हार
हवा जा के फुसफुसा दे कुछ यूँ उनके कानों में,
हम बुन रहे हैं फ़साना, उनके सामने भी रहकर वीरानों में,
दो चार मुस्कराती नज़रें ही पेश करें वो,
गुलिस्तानों के सारे मुस्कराते फूल रख दूँ उनके रेशम से बदन को भरूं तरानों में
बस सुन लेती गर वो हलचल हवाओं की
बरस जाती शायद फिर वही फुहार
मुतासिर हो तू बस मेरी, कह रहा दिल बार बार
करले मेरे इन आँखों से बातें चार