Sunday, 16 October 2016

यादें तेरी

यादें तेरी जब दिल में यूँ घुसपैठ करती हैं,
जैसे रात की बारिश साँस ठंडी कर जाती है।

मदमस्त हवाओं के झोंके,
बस कहीं से आकर, संग बैठकर गुनगुनाती है।
सुरों को इक लय मिलती है,
कोई खुशबू जब आती है।

लफ़्ज बस ग़जल बनकर,
इन होंठों से उतरते हैं।
पूछो ना फिर सरगोशी का आलम,
मैं कुछ यूँ सँभलता हूँ कि बस,
फिर लड़खड़ाता हूँ।
उठता हूँ, गिरता हूँ,
ये सिलसिला भी ताबड़तोड़ चलता है।

साँसों का कारोबार भी मस्त चलता है;
कभी कुछ ज्यादा गँवाता हूँ,
कभी कुछ कम ही मिलता है।
साँस भला कब धड़कन की गिनती करती है,

यादें तेरी जब दिल में यूँ घुसपैठ करती है।


Sunday, 9 October 2016

अपना मुझे बना लेना

दिल की उस टूटी डाली को,
जब तुमने छू कर देखा था।
जब अश्रु भरे इन नयनों में,
रंग चाहत का तुमने घोला था।

मायूसी चेहरे की मेरे,
तुम्हें रास न आया करती थी।
मुझे हँसाने की खातिर,
कभी नटखट सा कुछ करती थी।

कुछ सुखद छवि उन नयनों की,
दस्तक दे कर यूँ जाते थे।
नित नई चाहत जीने की,
धड़कन को यूँ सिखलाते थे।

क्यूँ हुआ वो सब पल बेगाना,
बेसाज़ हुआ है हर वो तराना।
कभी भूले बिसरे याद आऊँ,
मन के आँगन में फिर तुम आना।

फिर इन सूखे पत्तों पर,
जीवन की कुछ बूँदें टपकाना।
मुरझाये इन फूलों को,
झूम के गाना फिर सिखलाना।
छलक जाये गर आँसू का वो पैमाना,
सिने से मुझे लगा लेना।

फिर अपना मुझे बना लेना,
बस अपना मुझे बना लेना।


Saturday, 8 October 2016

शब्द तुम्हारे ऐसे हैं

गाते हो तो गाओ पक्षी,
सुनने को कब से आतुर हूँ।
नाम तुम्हारा जो भी है,
चंचलता से भरे हुए हो
कुछ शब्द तुम्हारे ऐसे हैं,
बस सुनने को जी करता है।

शाम की इस ठंडी छाँव में,
इक तान फिर से छेड़ दो तुम;
बचपन याद दिलाते हैं स्वर तुम्हारे,
आओ संग मैं भी कुछ गाऊँ,
चलो अब जिद छोड़ भी दो तुम।

वर्षा की ये रूत भी है मनोरम,
सुकून सा भर रहा जैसे तन - मन
अठखेलियाँ करती ये तुम्हारी जोड़ी,
फिर आँखों के सामने कुछ चित्र उभरते हैं यूँ ही
बरबस ही बारिश आती है;
आशाओं के इस आँगन में,
आओ आश्रय ले लो इस सूने क्षितिज तल में।
भर दो कुछ राग जरा सा,
खो जाऊँ कहीं फिर मधुबन में।

रिमझिम रिमझिम बारिश में,
रूनझुन रूनझुन गीत तुम्हारे
कुछ और देर ठहर जाते।
छद्म प्रहर के नगमें बुन कर,
मधु श्रवण कर्ण को दे जाते।
पर वर्षा अब मद्धम् हो चली,
जाओगे तुम भी अपने घर को।
सर छुपा कहीं किसी वृक्ष तले,
आराम दोगे नन्हे पर को।

फिर मिलेंगे किसी शाम,
मीठी करेंगे फिर कुछ यादें,
पर खोलोगे तुम,
और हम ख्वाबों के बाँहें।
पूरे अधूरे क्या रखा है,
बस सूर को सँभाले रखना तुम;

क्यूँ की शब्द तुम्हारे ऐसे हैं,
सुनने को बस जी करता है।



Monday, 3 October 2016

निराली शाम

आई है फिर ये शाम,
हमें करने यूँ बदनाम।
कहती मेरा क्या है?
आज बिखरी हूँ,
कल सँवर जाऊँगी,
आज भद्दी सी हूँ,
कल निखर जाऊँगी।

सोच जरा खुद की अब तो
कोई बँधन रोके है तुझको?
या कोई वक्त चुराये है तुझसे
कब से मैं आस लगाए बैठी हूँ
हँसी लब पे सजाए बैठी हूँ

तेरी भी चाहत है यही,
मैं जानती हूँ
मुझसे मिलने को है आतुर,
मैं जानती हूँ
कर दे सब तू भी सरेआम
ये शाम नहीं है आम,
कभी गालिब कभी खय्य़ाम

आ बैठें कुछ पल साथ
दो चार कर लें सुलझी बात
इस पल जो है,
दूजे पल न होगा
पैमानों में भरा ये जाम न होगा
कर दे खुद को बस मेरे नाम

कुछ छण की तो बात है
फिर रात निराली आ जाएगी,
इन नयनों पर छा जाएगी
गुस्ताखी करती है रात,
खेलती जज़्बातों के साथ
सपने दिखाती, नींदें उड़ाती
करवटों पे थपकीयाँ दे जाती
नशे में लाकर होश उड़ाती
अब मैं ना रही किसी काम
ढ़ल रही है शाम,
खत्म हुआ है ज़ाम।

रात की बाहें खुली हैं
अब कर ले थोड़ा आराम।
गर फिर कल मिली ये शाम,
देंगे फिर इसे कोई नाम।
मैं हूँ भोली, थोड़ी बहक जाती हूँ,
आँखों से कभी छलक जाती हूँ
सँभाल के रखो मोतीयों को
वरना करेंगे सब मेरी बुराई,
लगेगा हम पे सब इल्ज़ाम।

बस चलती है अब शाम।

Saturday, 7 March 2015

24/7 की यादें

अनोखे से उस दुनिया में, कुछ लोग अनोखे बसते थे;
मस्ती के उन लम्हों में, हंसी के फ़साने बुनते थे;
याद फिर उन लम्हों की आती है,
होठों पे खुशियों की चादर बिछाया करते थे

"शबनम" सी थी वह चांदनी, "सिंधु" की वाक् धारा बहती थी
"दीन" होता था कितना रमणीय, "प्रवीण" जब कार्यशैली होती थी
शबनम की अदा निराली, नखरे कुछ अजब से होते थे
"नारायण" की टिप्पणियों पर हंसी के फव्वार्रे छूटते थे

Farzu, Dinsu, Shabbu, Sandra -- ये नाम कर्णप्रिय होते थे,
Garry, Bajji, Sami, JayD के सब लोग दीवाने होते थे;
Poonam, Halini, Anu जैसे कुछ नाम नए से उभरे थे,
"Sudha Rani" भी रानी थी, Ethinic day पर जब हम सजते थे;

हिरणी सी आँखें थी उसकी, Halini' तो आखिर हरिणी थी,
मधुर स्वर और भोलापन, सबको आकर्षित करती थी
Paul was the man, man! Deeps भी सुर्ख़ियों में होती थी
रोज़ रंग चढ़ता था नया, और समां भी नयी बंधती थी
संगीत के चाहने वालों की, एक फ़ौज़ भी उमड़ा करती थी

उत्साहित, उत्प्रेरित से थे सब लोग, उदासी के निशाँ दुर्लभ होते थे
शब्दों के ही बाण सभी के, लफ्जों में हंसी के स्वर भरते थे
हर-एक की सफलता में हम, अपनी भी सफलता देखते थे

लम्हें शायद वह अब भी वहीँ, पृथक पर हम हो चले हैं
हंसी ख़ुशी तो है अब भी, पर थोड़े नीरस से हो चले हैं

रहे सदा वह आलम ख़ुशी का, लोग तो आते जाते रहेंगे
पर उन अनोखे लम्हों को, हम याद हमेशा किया करेंगे |

रहगुज़र

कब के मिले हम, आज फिर से बिछड़ चले हैं
बस बिछड़ चले हैं

कस्ती पार लगी ना लगी, साँसों के पैमाने जैसे टूट चले हैं

कश्तियाँ आती जाती रहेंगी, रहगुज़र बस बदलते रहेंगे
कहीं कभी किसी किनारे पर, हम फिर बैठे मुस्कुराएंगे
यादें फिर बीते दिनों की लिए, सपनों की दुनियां बसाएंगे

फिर मोती आँखों में भर चले हैं
कब के मिले हम, आज फिर बिछड़ चले हैं

तुम सा गर फिर कोई मिल जाएगा,
दिल को ज़रा सुकून शायद मिल पायेगा
बस यही आश दिल में लिए, धड़कनों को थामे,
निगाहें बस हम फेर चले हैं

कब के मिले हम, आज फिर बिछड़ चले हैं

कस्ती न थी ये कागज़ की, जो बचपन के संग भूल जाएँ
पाने को अभी बहुत कुछ है, खोने को अभी सब बाकी है
पर दिल की इस खलिश को, कैसे भला यूँ भूल जाएँ

ठहरा पल, ठहरी सी ज़िन्दगी, पाँव जैसे ठहरे से चले हैं

कब के मिले हम, आज बस बिछड़ चले हैं

कस्ती पार लगी न लगी,
साँसों के पैमाने जैसे टूट चले हैं

Wednesday, 4 March 2015

प्यार से प्यार करे ये नैना

इतने चंचल न होवे नैना, जिगर में प्यास दिए दिन रैना
दिल की तड़प को पढ़ ले ज़ालिम, जब यूँ हंस हंस के ताके नैना

सजा सुनहरे ख्वाहिश को इसने, कितनों की फितरत बदली  है;
मजहब कितनों की बदली है, करतब हर किस की बदली है,
वार करे मदमस्त लगे, दो धारी तलवार ये नैना;
घायल कर इस कदर जिया को, हर पल हर क्षण खुश होवे नैना

इतने  चंचल न होवे नैना, प्यार से प्यार करे ये नैना

उन मखमली पलकों के पीछे,  कुछ सपने छुपे तो हैं,
जूनून ए इश्क़ की तलाश में  हर पल ये तड़पे तो हैं
इक आजाद पंछी की उड़ान, हर छन  भरना  चाहे ये नैना
दिल की दहलीज़ पर दस्तक सा, हर पल हर क्षण देवे ये नैना

कुछ नादाँ से हैं ये नैना, जिगर में प्यास दिए दिन रैना
दिल की  तड़प को पढ़ ले ज़ालिम, जब जब अन्दर से झांके नैना

इतने चंचल न होवे नैना, बस प्यार से प्यार करे ये नैना

Monday, 1 September 2014

हमराज़ अपना वो बना के तो देखे

हूर पड़ी इक बैठी सामने,
पलट पलट नज़र लागे उसको तकने
दिल करे कुछ गलां कर लूँ
जी चाहे संग उसके हंस लूँ
फिर मन को समझाऊँ,
है वह एक मुसाफ़िर,
करूँ क्या उससे गुज़ारिश,
बस नयनों को कुछ सुकून ले लेने दूं,
 ज़रा खुशबु सी कुछ बिखरी है फ़ज़ा में,
लफ्जों को इनकी ग़ज़ल पढ़ लेने दूँ
कुछ मासूमियत सी उन पलकों में
रंगीन से हलचल में, उज़ली किरणें उसके तन मन में
चाँद तारों की बातें मैं ना करूँ
हमराज़ अपना वो बना के तो देखे
दुग्ध मेखलाओं की श्रृंखलाएँ बना दूँ

Sunday, 17 August 2014

मुतासिर हो तू बस मेरी

मुतासिर हो तू बस मेरी, कह रहा दिल बार बार
 करले मेरे इन आँखों से बातें चार
 धड़कनों को गजल बना दूँ,
सांसें अपनी चुरा के दो चार

 होंठ उनके फूल की पंखुड़ियों सी लगे
 जिस्म उसकी निर्मल धारा सी लगे
 मेरी ग़ज़ल भी कुछ कर दे उनका श्रृंगार
 मौका मिले फिर इसे भी, झूम के गा लेता मल्हार

 हवा जा के फुसफुसा दे कुछ यूँ उनके कानों में,
हम बुन रहे हैं फ़साना, उनके सामने भी रहकर वीरानों में,
 दो चार मुस्कराती नज़रें ही पेश करें वो,
गुलिस्तानों के सारे मुस्कराते फूल रख दूँ उनके रेशम से बदन को भरूं तरानों में
 बस सुन लेती गर वो हलचल हवाओं की
 बरस जाती शायद फिर वही फुहार

मुतासिर हो तू बस मेरी, कह रहा दिल बार बार
 करले मेरे इन आँखों से बातें चार

Friday, 6 June 2014

फिर आज कोई मधुशाला लिख दे

आज कलम कुछ ऐसा लिख दे, अनसुना सा छंद कुछ वैसा लिख दे
सूरज की परिभाषा लिख दे, पृथ्वी की अभिलाषा लिख दे
कब से सोया है चुपचाप, फिर आज कोई मधुशाला लिख दे
इस रंग महल में मैं भी हूँ, तू भी है
रंगत भी है, संगत भी है,
फिर क्यों खोया - खोया सा है,
क्या तू भी सोया - सोया सा है?
अब ख़त्म करो ये ख़ामोशी, बस बहुत हुई अब मायूसी
गरज बरस घनघोर घटा सा, चल तू भी कुछ मनचाहा लिख दे,
कुछ सघन - विरल नवशाला लिख दे
कब से सोया है चुपचाप, फिर आज कोई मधुशाला लिख दे
पर्दा कब तक तू डालेगा, कब राज़ जिया के खोलेगा ?
इस ठगी संसार के आगे कब तक तू मुँह न खोलेगा
ज़रा देखो अपने ईर्द - गिर्द, अजीब सा भागम भाग है, विचित्र से कुछ शोर में,
विलय हुआ अनुराग है
कुछ उम्मीद जगा, फिर दीप जला ,
क्षमता फिर अपनी प्रबल दिखा
उलट - पलट फिर तरंगों जैसा ,
फिर आज कोई नवगाथा लिख दे
चाहे तो खुद की वर्णमाला लिख दे
कब से सोया है चुपचाप, फिर आज कोई मधुशाला लिख दे

Sunday, 1 June 2014

मानवता भी जैसे दिखावटी सी लगती है


चेहरे की मुस्कुराहट बनावटी सी लगती है,
मानवता जैसे दिखावटी सी लगती है
फिर नव रचना को लालायित,
दुनियां छँटी - बँटी सी लगती है

हे सृष्टिकर्ता! तुमने जब मानव बनाया,
कितनी करुणा - सहिष्णुता मानव ने अपनाया
प्यार का महत्व सबसे ऊपर बताया,
अधूरा है मानव बिना 'प्यार', कुछ ऐसा बताया

भौतिकता की आंधी 'मानवता' उड़ाए जा रही,
प्यार मानव के ह्रदय से विलुप्त किये जा रही,
करुणा भरे नयन विर्लय से लगते हैं,
सब बंधन छणिक और भ्रमिक से लगते हैं

मानवता भी जैसे दिखावटी सी लगती है

अद्भुत होगा तब मानव जब न भाषा ज्ञान रही होगी
आँखों से ही बातें होती होंगी, आँखों में प्यार रहा होगा,
प्रकृति की अनंत सुंदरता, मानव में भी रही होगी
प्यार के बस इशारे होते होंगे, इशारों में भी प्यार रहा होगा

आज इशारों में दिलो जान तबाह होती सी लगती है,
प्यार की दुनियां भी तबाह होती सी लगती है
मानवता भी जैसे दिखावटी सी लगती है
फिर नव रचना को लालायित, दुनियां छँटी - बँटी सी लगती है

Friday, 4 October 2013

बस वही हूँ मैं

मिले थे कभी हम तुम
ख़ामोशी में थे यूँ गुमशुम
वो पल, वो रुत, वो रंग, वो ढंग
वो चाल, वो ढाल, वही थी वो अदा
वक़्त ने छीना हो भले ये सब हमसे,
दिल की  नाराजगी वही,
धड़कन भी वही,
बस वही हूँ मैं
डरा डरा सा सहमा सा मैं
लड़कपन की दौर में सुलझा उलझा सा मैं

खोया हूँ शायद कुछ रंग अपने,
सच करना चाहे दिल, देखे हुए हर एक सपने
कुछ चेहरे खोये हैं बस,
सपने अब भी वही, ज़िन्दगी अब भी वही
बस वही हूँ मैं,
हाँ, वही हूँ मैं

Tuesday, 6 August 2013

ठहरे से इन लम्हों में

ठहरे से इन लम्हों में, फिर आज कोई हलचल भर दो
नैनों के खाली प्यालों में, फिर आज कोई शरबत भर दो

जुल्फों का संवारना कानों के पीछे, अब भी आता है याद मुझे
फिर धीरे से मुस्कुरा कर, नज़रें झुकाना है याद मुझे
भीनी खुशबू उन जुल्फों की, अब भी करती मदहोश मुझे

उन भींगे लटों से छूकर, गुदगुदी बदन में फिर  दो
ठहरे से इन लम्हों में , फिर आज कोई हलचल भर दो

शरारती उन आँखों का चमकना ,बिजली भरती थी तन मन में
पलकों से इशारा कर, झट से पलटना है याद मुझे
होठों पे हंसी के रंगीं शबनम, अब भी बारिश करते मन में

तन्हाई के इस दामन में, फिर थोड़ी सी शरारत भर दो
ठहरे से इन लम्हों में, फिर आज कोई हलचल भर दो

Friday, 2 August 2013

थोड़ा और बरस


अभी ना हुए सराबोर
तन मन लागे अब भी कठोर
बादल तू थोड़ा और बरस

तस्वीर पिया की जिया में, अभी ना धुली  है
अंखियन में प्यास मोतीयन की, अभी ना बुझी है
भुलाने याद पिया की, न जाने जाना है किस ओर
तन मन लागे अब भी कठोर
बादल तू थोड़ा और बरस
थोड़ा और बरस

दिवा स्वप्न अब भी देखे मन हर पहर
उठती गिरती आवेगों और संवेगों की लहर
धुआं धुआं सा है हर सेहर, हर डगर
बहुत हुआ ये तकना राहों का
शैयां आ जाओ,
कर दो फिर से भोर

तन  मन लागे अब भी कठोर
बादल तू थोड़ा और बरस
थोड़ा और बरस 

Wednesday, 31 July 2013

चंचल से नैना

इतने चंचल न होवे नैना, जिगर में प्यास दिए दिन रैना
दिल की  तड़प को पढ़ ले ज़ालिम, जब जब अन्दर से झांके नैना

इन्हीं चंचल नैनों ने जाने क्या कब किस पर ज़ुल्म किये,
भोले से कितने चेहरों पर जब ज़ी चाहा, सितम हैं किये,

सजा सुनहरे ख्वाबों को , इसने कितनों की फितरत बदली  है;
हसरत कितनों की बदली है , सोहरत किस किस की लूटी है;

वार करे मदमस्त लगे, दो धारी तलवार ये नैना;
घायल कर जिया को, इस कदर खुश होवे नैना
इतने  चंचल न होवे नैना

उन मखमली पलकों के पीछे भी कुछ सपने छुपे तो हैं,
दर्द के हर एक दस्तक पर, मोती इनसे बहे तो हैं

हर डगर, हर पहर, एक नयी कहानी कहते से नैना
सब  सहकर चुप रहकर, बयां कशिश कर रोवे नैना
कुछ नादाँ से हैं ये नैना, जिगर में प्यास दिए दिन रैना
दिल की  तड़प को पढ़ ले ज़ालिम, जब जब अन्दर से झांके नैना

इतने चंचल न होवे नैना 

Sunday, 9 June 2013

यह कदम तेरे और पथ भी तेरा

यह कदम तेरे और पथ भी तेरा
बस चला चल, चाहे हो निशा या हो सवेरा

सुगम बना हर डगर, कर सुघर
होगा हर बीहड़ सहर, पार करेगा तू अंधेर गलियां ,
सफलता हर हाल में हो तेरी,
कर ले यह प्रण तू,  सुलझाएगा तू हर पहेलियाँ

आज है इस पड़ाव , कल उस पड़ाव होगा तेरा डेरा
यह कदम तेरे और पथ भी तेरा
बस चला चल, चाहे हो निशा या हो सवेरा

छोड़ अपने कदमो के निशां, लम्हों की सुनहरी रेत पर
याद करे ज़माना तुझे, लिख दास्ताँ ऐसी भौतिक पटल पर
गिरना भी होगा तुझे, संभलेगा फिर खुद ही,
रुकने का जब करे दिल तेरा, प्यास थोड़ी और तीव्र कर,

हटेगा फिर हर ओझलता का सेहरा
यह कदम तेरे और पथ भी तेरा
बस चला चल, चाहे हो निशा या हो सवेरा

बन शिला कर प्रहार, जब हो मुश्किलें बड़ी
नम्रता हो तेरा बल, जब सरल लगे रास्ते हर घडी
वाणी में हो कोमलता कमल सी, फिर हर दिल पर करेगा राज तू
आत्मविश्वास से भरा हो हर कदम
पायेगा मंजिल हर हाल में तू

हजारों मीलों के इस सफ़र में, खुद का तू  ही होगा सहारा
बस चला चल, चाहे हो निशा या हो सवेरा

यह कदम तेरे और पथ भी तेरा

Friday, 31 May 2013

मन तू प्यासा प्रेम का

मन तू प्यासा प्रेम का, चल चलें उसीकी तलाश में

बुझ जाये आज ये अगन भी, कब तक रहें इस प्यास में
ले चलो पार ये नैया भी तुम, उन्मुक्त अचल परिवास में

हो आज प्रबल बन प्रखर, डगर है बड़ा ये कठिन
तीखे मोड़ करेंगे कोशिश,
रुकना ना तू,
पड़ना ना तू इन अवरोधों के कयास में

ले चलो पार ये नैया भी तुम, उन्मुक्त अचल परिवास में

बरसाओ बादल आज सुधा तुम,
दिखा आज फिर सतरंगी सपने,
मिले कुछ  राहत ह्रदय के जलन को,
नयन कब से हैं तरसे, दिलबर की आस में

मन तू प्यासा प्रेम का, चल चलें उसीकी तलाश में
बुझ जाये आज ये अगन भी, कब तक रहें इस प्यास में

Saturday, 25 May 2013

ख्वाहिश थी तुझमें खोने की


ख्वाहिश थी तुझमें खोने की, हसरत भी थी ग़म में रोने की साथ

हर राह चुनुं मैं तेरे साथ, ख्वाहिश थी उनपर चलने की साथ
हँसना भी चाहा था साथ, चाहत की थी रोने की भी तेरे साथ
तेरे साये में रहूँ मैं हरदम, तेरी धड़कन मेरा नाम लें
जब धड़कन लगे रुकने, तू ही आ कर थाम ले

ख्वाहिश थी तुझमें खोने की, हसरत भी थी तेरे ग़म में रोने की साथ

चांदनी रात हो, नीला अम्बर हो झील के पार
चाँद भी हो आगोश में मेरे, तारों की चमक देखूं तेरे आंचल के पार
समुन्दर की गहराई से रूबरू होऊं मैं, जब करूँ तेरे आँखों का दीदार
सारी दुनियां भुलाऊँ जब साथ हो तेरी  बाँहों का गलहार

ख्वाहिश थी तुझ  में समाने की, हसरत थी साँसों की माला गिनने की साथ

जब शाम की चादर ढले, बाँहों के दरमियाँ तुझको पाऊँ
हर करवट हो तेरे साथ, करवटों की सलवटें  भी  तेरे साथ
धड़कन की आहट हो साथ, सिसकन और सिहरन भी साथ
साँसों की थिरकन हो साथ, थिरकन के क्रंदन भी साथ

ख्वाहिश थी तुझमें खोने की, हसरत भी थी ग़म में रोने की साथ

जिंदगी के कुछ हसीं पल साथ ले कर चलूँगा मैं
तेरी याद जब जब आएगी एक गीत गाया करूँगा मैं
तेरे प्यार को मैं जिन्दा रखूँगा इन्ही लम्हों के आंगन में
ख्वाहिश की तो फेहरिस्त बहुत है, कुछ फिर कभी गाऊंगा मैं


बस ख्वाहिश थी तुझमें खोने की, हसरत भी रहेगी ग़म में रोने की साथ

Saturday, 13 April 2013

आंसुओं की किस्मत


न जाने इन आंसुओं की किस्मत में क्या है
बह चले हैं, मंजिल का पता क्या है

बेरंग होकर भी एक चमक है इनमें
हो ना हो कोई कसक है इनमें

दोस्ती इनकी धडकनों से है
दिल की उलझनों से है
दर्द से है, उनकी तरंगों से है

बेअदब हैं, बेबाक हैं ये
फिर भी बहुत कुछ कह जाते हैं

आँखों से निकली है जिनकी
व्यथा उनकी सुना जाते हैं

कभी बहते हैं किसी के इंतेजार में
कभी किसी के प्यार में

कभी सांसों के व्यापार में
कभी बाँहों के गलहार में

फिर रिश्तों के दरकिनार में
या प्रेमी के पुकार में

निः स्वार्थ और निष्पक्ष हैं ये
निर्मल और निश्छल भी

निरंतर अन्याय होता इन पर
रास्ते में ही मिट जाते अस्तित्व इनके

फिर भी बह चले हैं
ना जाने इनकी किस्मत में क्या है

Saturday, 2 February 2013

तुम क्यूँ न हुए मेरे


चुप से थे लव्ज़ पर आँखें बोल रही थी
समय के रेत पर हमारी धडकनें खेल रही थी
हम थे इतने पास कि सांसें विलय होती थी
स्पर्श से तुम्हारे एक उर्जा सम्मुख होती थी
सभी दुःख और व्याधि छू मंतर होती थी
और हँसी के पल में भी अश्रु बहा करते थे
अब नहीं वो अंगडाईयाँ हैं, अठखेलियों के भी निशां नहीं हैं
कहीं खो कर रह गयी अदा से झपकती पलकें
होठों के भी रंग धूमिल पड़े हैं
गुस्से और प्यार का मिश्रण नहीं अब
रूठ कर मनाना अब रास नहीं हैं
जाने उन पलों को मैंने खोया क्यूँ,
पूरा जो न हो सका,दिल ने वो ख्वाब पिरोया क्यूँ,
उन हसीं लम्हों को गवायाँ  क्यूँ
बस यही सवाल है दिल का...
तुम क्यूँ न हुए मेरे, तुम क्यूँ न हुए मेरे